रिवर फ्रंट घोटाला मामले में एनफोर्समेंट डिपार्टमेंट (ईडी) ने गुरुवार को बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया. यूपी के लखनऊ में कई जगहों समेत देश के कई राज्यों में एक साथ छापेमारी की जा रही है. इन राज्यों में यूपी के अलावा हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली शामिल हैं. नोएडा के सेक्टर-62 में भी सर्च ऑपरेशन जारी है. जिसमें कई इंजीनियर, सिंचाई विभाग के कई अधिकारियों के खिलाफ भी ये कार्रवाई की जा रही है.
दरअसल, समाजवादी पार्टी (एसपी) के शासनकाल में लखनऊ में बने गोमती रिवरफ्रंट के निर्माण में वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं. उप्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद गोमती रिवरफ्रंट का दौरा किया था. जिसके बाद गोमती नदी चैनलाइजेशन प्रोजेक्ट और गोमती नदी रिवरफ्रंट डेवलपमेंट में हुई वित्तीय अनियमितताओं की न्यायिक जांच हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आलोक सिंह की अध्यक्षता में गठित समिति ने की थी.
समिति ने अपनी रिपोर्ट 16 मई 2017 को राज्य सरकार को सौंपी थी. जिसमें दोषी पाए गए अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराए जाने की सिफारिश की गई थी. समिति ने जांच के घेरे में आए तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन और तत्कालीन प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश भी की थी.
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मामले में नामजद आरोपियों तत्कालीन चीफ इंजीनियर गोलेश चंद्र (रिटायर्ड), एसएन शर्मा, काजिम अली और सुपरिटेंडेंट इंजीनियर शिवमंगल यादव (रिटायर्ड), अखिल रमन, कमलेश्र्वर सिंह, रूप सिंह यादव (रिटायर्ड) और एग्जीक्यूटिव इंजीनियर सुरेशयादव के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है. सीबीआई नामजद आरोपियों से पूछताछ करने के साथ ही कई अहम दस्तावेज कब्जे में ले चुकी है.
रिवरफ्रंट के निर्माण के लिए 747.49 करोड़ का बजट था. बताया जाता है कि बाद में मुख्य सचिव की बैठक में निर्माणकार्य के लिए 1990.24 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया गया था. जुलाई, 2016 में 1513.51 करोड़ रुपये मंजूर हुए थे. निर्माणकार्य में स्वीकृत राशि से 1437.83करोड़ रुपये खर्च हुए थे, लेकिन करीब 60 फीसदी काम ही पूरा हो सका था.
वहीं मामले की शिकायत के मुताबिक, सपा सरकार के दौरान गोमती नदी के किनारे को विकसित करने की योजना शुरु की गई थी, जिसमें 1513 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे. इस खर्चे में गड़बड़ी की शिकायतें मिली थीं, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की.
योगी सरकार के प्रदेश की सत्ता में आने के बाद इस घोटाले में जांच के आदेश दिए थे, जिसके बाद इसमें जांच शुरू हुई थी. 19 जून 2017 को पुलिस ने भी इस मामले में केस दर्ज किया था. बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी. ईडी इस मामले में जांच कर रही है और आज कई अधिकारियों समेत इंजीनीयरों के ठिकानों पर छापे मारे जा रहे हैं.
Thursday, January 24, 2019
Wednesday, January 16, 2019
Failed UP Police बड़ा सवालः क्या फर्जी हैं योगी राज में हुए एनकाउंटर?
23 महीने. 13 सौ एनकाउंटर. 60 मौत. 350 घायल और 3 हज़ार से ज़्यादा गिरफ्तार. या यूं कहें कि सरेंडर. ये यूपी में योगीराज के दौरान हुए एनकाउंटर का वो मीटर है, जो ये बता रहा है कि राज्य की पुलिस ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एनकाउंटर के हुक्म को कितनी संदजीदगी से लिया है. यूपी पुलिस का ऑपरेशन ''ठोक दो'' इतना चर्चा में है कि अब संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार ने भी इस पर सवाल उठा दिए है. इतना ही नहीं अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इस ठांय-ठांय पर अपनी नज़रें टेढ़ी करते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी कर योगी सरकार से जवाब मांग लिया है. लिहाज़ा अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यूपी में हुए एनकाउंटर फ़र्ज़ी थे?
तो क्या योगीराज में हुए एनकाउंटर फर्ज़ी थे? तो क्या अपराधियों को जानबूझकर बनाया गया निशाना? मारे गए अपराधियों को क्यों नहीं किया गया गिरफ्तार? ये सवाल अब सूबे की सरहद को पार कर अदालत की दहलीज़ तक आ गया है. क्योंकि जब से यूपी में योगीराज आया है तब से 13 सौ से ज़्यादा एनकाउंटर हुए. 59 अपराधियों की मौत हो गई. 327 अपराधी घायल हुए और 3,124 अपराधी या तो अरेस्ट हुए या उन्होंने सरेंडर कर दिया.
शायद इसीलिए ये सवाल उठ रहे हैं कि जिन अपराधियों को मारा गया क्या उन्हें ज़िंदा नहीं पकड़ा जा सकता था. बस योगी की इसी बात को सूबे के पुलिसवालों ने सीरियसली ले लिया. और ऐसे दनादन एनकाउंटर किए कि विपक्षियों को कहना ही पड़ा कि ये योगीराज नहीं बल्कि एनकाउंटर राज है. और तो और खुद यूनाइटेड नेशन ह्यूमन राइट ने भी यूपी में हुए एनकाउंटर पर सवाल उठाए. लिहाज़ा इतने आरोपों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को एनकाउंटर के सिलसिले में नोटिस जारी कर दी है.
दरअसल, अदालत में इन एनकाउंटर्स पर सवाल उठाते हुए एक पीआईएल दायर की गई है. जिसमें इस बात की मांग की गई है कि यूपी में हुई पुलिस मुठभेड़ों की अदालत की निगरानी में सीबीआई या एसआईटी से जांच कराई जाए. लिहाज़ा, पीआईएल पर आदेश देते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा- ये एक गंभीर मामला है जिसमें विस्तार से सुनवाई की आवश्यकता है. अब इस मामले में 12 फरवरी को सुनवाई होगी.
दरअसल, यूपी में इन एनकाउंटर को लेकर विरोधी लगातार सवाल उठा रहे थे कि सूबे की पुलिस अपने राजनैतिक आका को खुश करने के लिए फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम दे रही है. अगर सही माएने में अपराधियों को सफाया होता तो प्रदेश में लोग बिना खौफ के जी रहे होते. तो एनसीआरबी के आंकड़ें भी यूपी सरकार के दावों की पोल खोल रहे हैं.
कुछ दिन पहले यूपी पुलिस की कुछ तस्वीरें सामने आई थीं. एक सीओ साहब थाने का निरीक्षण करने पहुंचे तो पाया कि पुलिसकर्मियों को बंदूक चलानी नहीं आती. पिस्टल लोड कैसे करते हैं पता नहीं. हथियारों के नाम तो खैर कौन याद रखे. ऊपर से गोली और आंसू गैस के गोले की एक्सपाय़री डेट कब निकल गई याद ही नहीं. अब ऐसे में आप यूपी पुलिस से क्या उम्मीद करेगें? बस इतना ही कह सकते हैं कि सचमुच कमाल है योगी जी की पुलिस. अब कोई बुरा ना मान जाए तो लगे हाथ ये भी बता दें कि यूपी पुलिस की इतनी सारी काबलिय़त की पोल-पट्टी कोई और नहीं बल्कि खुद यूपी पुलिस ही खोल रही है. ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ. जब मौका आया तो बंदूक चली ही नहीं. हालांकि ये भी सरकारी बंदूकें हैं.
अब बात उन तस्वीरों की जो अलग-अलग एनकाउंटर के बाद सामने आई. है ना कमाल? एक तरफ़ यूपी की सरकारी बंदूकें चलती ही नहीं थी, और फिर अचानक वही बंदूकें दनादन गोलियां उगल रही हैं. उगले भी क्यों ना? जब ट्रिगर पर ऊंगली योगी के फरमान की हो और एनकाउंटर सरकारी आदेश तो गोलियां तो चलेंगी ही.
सवाल ये है कि अचानक यूपी में एकाउंटर की झड़ी क्यों लग गई? क्या य़ूपी में क़ानून व्यवस्था इस कदर चरमरा गई है कि एनकाउंटर के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा? क्या यूपी में क्रिमिनल इस कदर बेलगाम हो चुके हैं कि अचानक पूरे सोसायटी के लिए खतरा बन गए? क्या यूपी की पुलिस इस कदर बेबस हो गई कि क्राइम पर कंट्रोल ही नहीं कर पा रही है? या फिर सरकार ने सबसे आसान रास्ता चुन लिया है कि क्राइम खत्म करना है, तो क्रिमिनल को ही खत्म कर दो. पर क्या ये रास्ता सही है? क्या यूपी की कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए एनकाउंटर ही एकमात्र रास्ता और आखिरी हथियार है? अगर हां, तो फिर जब तक ये एनकाउंटर जारी है, तब तक के लिए क्यों ना यूपी की तमाम अदालतों पर ताला लगा देना चाहिए? वैसे भी अदालतों की जगह इंसाफ़ तो अब सड़क पर ही हो रहा है. वो भी गोलियों से.
हिंदुस्तान का पहला एनकाउंटर
एनकाउंटर यानी मुठभेड़ शब्द का इस्तेमाल हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बीसवीं सदी में शुरू हुआ. एनकाउंटर का सीधा सीधा मतलब होता है बदमाशों के साथ पुलिस की मुठभेड़. हालांकि बहुत से लोग एनकाउंटर को सरकारी क़त्ल भी कहते हैं. हिंदुस्तान में पहला एनकाउंटर 11 जनवरी 1982 को मुंबई के वडाला कॉलेज में हुआ था, जब मुंबई पुलिस की एक स्पेशल टीम ने गैंगस्टर मान्या सुरवे को छह गोलियां मारी थी. कहते हैं कि पुलिस गोली मारने के बाद उसे गाड़ी में डाल कर तब तक मुंबई की सड़कों पर घुमाती रही, जब तक कि वो मर नहीं गया. इसके बाद उसे अस्पताल ले गई. आज़ाद हिंदुस्तान का ये पहला एनकाउंटर ही विवादों में घिर गया था.
उत्तर प्रदेश में तमाम एनकाउंटर इसलिए सवाल खड़े करते हैं कि इनमें से हर एनकाउंटर ऐलानिया कह कर किया गया. सूत्रों के मुताबिक यूपी एसटीएफ और तमाम ज़िला पुलिस को बाक़ायदा घोषित अपराधियों की लिस्ट भेजी गई और उसी लिस्ट के हिसाब से यूपी में एनकाउंटर जारी हैं.
वैसे इसे पता नहीं इत्तेफाक कहेंगे या कुछ और कि पहले खुद योगी आदित्यनाथ को यूपी सरकार और यूपी पुलिस से खुद के लिए संरक्षण मांगनी पड़ी थी. वो भी संसद भवन के अंदर. तब उन्होंने बाकायदा रोते हुए कहा था कि यूपी सरकार उन्हें झूठे आपराधिक मामलों में फंसा रही है. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. अब वही योगी यूपी की सरकार के सरदार हैं और यूपी पुलिस उनके आधीन. अब संरक्षण कोई और मांग रहा है.
तो क्या योगीराज में हुए एनकाउंटर फर्ज़ी थे? तो क्या अपराधियों को जानबूझकर बनाया गया निशाना? मारे गए अपराधियों को क्यों नहीं किया गया गिरफ्तार? ये सवाल अब सूबे की सरहद को पार कर अदालत की दहलीज़ तक आ गया है. क्योंकि जब से यूपी में योगीराज आया है तब से 13 सौ से ज़्यादा एनकाउंटर हुए. 59 अपराधियों की मौत हो गई. 327 अपराधी घायल हुए और 3,124 अपराधी या तो अरेस्ट हुए या उन्होंने सरेंडर कर दिया.
शायद इसीलिए ये सवाल उठ रहे हैं कि जिन अपराधियों को मारा गया क्या उन्हें ज़िंदा नहीं पकड़ा जा सकता था. बस योगी की इसी बात को सूबे के पुलिसवालों ने सीरियसली ले लिया. और ऐसे दनादन एनकाउंटर किए कि विपक्षियों को कहना ही पड़ा कि ये योगीराज नहीं बल्कि एनकाउंटर राज है. और तो और खुद यूनाइटेड नेशन ह्यूमन राइट ने भी यूपी में हुए एनकाउंटर पर सवाल उठाए. लिहाज़ा इतने आरोपों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को एनकाउंटर के सिलसिले में नोटिस जारी कर दी है.
दरअसल, अदालत में इन एनकाउंटर्स पर सवाल उठाते हुए एक पीआईएल दायर की गई है. जिसमें इस बात की मांग की गई है कि यूपी में हुई पुलिस मुठभेड़ों की अदालत की निगरानी में सीबीआई या एसआईटी से जांच कराई जाए. लिहाज़ा, पीआईएल पर आदेश देते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा- ये एक गंभीर मामला है जिसमें विस्तार से सुनवाई की आवश्यकता है. अब इस मामले में 12 फरवरी को सुनवाई होगी.
दरअसल, यूपी में इन एनकाउंटर को लेकर विरोधी लगातार सवाल उठा रहे थे कि सूबे की पुलिस अपने राजनैतिक आका को खुश करने के लिए फर्जी मुठभेड़ों को अंजाम दे रही है. अगर सही माएने में अपराधियों को सफाया होता तो प्रदेश में लोग बिना खौफ के जी रहे होते. तो एनसीआरबी के आंकड़ें भी यूपी सरकार के दावों की पोल खोल रहे हैं.
कुछ दिन पहले यूपी पुलिस की कुछ तस्वीरें सामने आई थीं. एक सीओ साहब थाने का निरीक्षण करने पहुंचे तो पाया कि पुलिसकर्मियों को बंदूक चलानी नहीं आती. पिस्टल लोड कैसे करते हैं पता नहीं. हथियारों के नाम तो खैर कौन याद रखे. ऊपर से गोली और आंसू गैस के गोले की एक्सपाय़री डेट कब निकल गई याद ही नहीं. अब ऐसे में आप यूपी पुलिस से क्या उम्मीद करेगें? बस इतना ही कह सकते हैं कि सचमुच कमाल है योगी जी की पुलिस. अब कोई बुरा ना मान जाए तो लगे हाथ ये भी बता दें कि यूपी पुलिस की इतनी सारी काबलिय़त की पोल-पट्टी कोई और नहीं बल्कि खुद यूपी पुलिस ही खोल रही है. ऐसा एक बार नहीं, बार-बार हुआ. जब मौका आया तो बंदूक चली ही नहीं. हालांकि ये भी सरकारी बंदूकें हैं.
अब बात उन तस्वीरों की जो अलग-अलग एनकाउंटर के बाद सामने आई. है ना कमाल? एक तरफ़ यूपी की सरकारी बंदूकें चलती ही नहीं थी, और फिर अचानक वही बंदूकें दनादन गोलियां उगल रही हैं. उगले भी क्यों ना? जब ट्रिगर पर ऊंगली योगी के फरमान की हो और एनकाउंटर सरकारी आदेश तो गोलियां तो चलेंगी ही.
सवाल ये है कि अचानक यूपी में एकाउंटर की झड़ी क्यों लग गई? क्या य़ूपी में क़ानून व्यवस्था इस कदर चरमरा गई है कि एनकाउंटर के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा? क्या यूपी में क्रिमिनल इस कदर बेलगाम हो चुके हैं कि अचानक पूरे सोसायटी के लिए खतरा बन गए? क्या यूपी की पुलिस इस कदर बेबस हो गई कि क्राइम पर कंट्रोल ही नहीं कर पा रही है? या फिर सरकार ने सबसे आसान रास्ता चुन लिया है कि क्राइम खत्म करना है, तो क्रिमिनल को ही खत्म कर दो. पर क्या ये रास्ता सही है? क्या यूपी की कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए एनकाउंटर ही एकमात्र रास्ता और आखिरी हथियार है? अगर हां, तो फिर जब तक ये एनकाउंटर जारी है, तब तक के लिए क्यों ना यूपी की तमाम अदालतों पर ताला लगा देना चाहिए? वैसे भी अदालतों की जगह इंसाफ़ तो अब सड़क पर ही हो रहा है. वो भी गोलियों से.
हिंदुस्तान का पहला एनकाउंटर
एनकाउंटर यानी मुठभेड़ शब्द का इस्तेमाल हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बीसवीं सदी में शुरू हुआ. एनकाउंटर का सीधा सीधा मतलब होता है बदमाशों के साथ पुलिस की मुठभेड़. हालांकि बहुत से लोग एनकाउंटर को सरकारी क़त्ल भी कहते हैं. हिंदुस्तान में पहला एनकाउंटर 11 जनवरी 1982 को मुंबई के वडाला कॉलेज में हुआ था, जब मुंबई पुलिस की एक स्पेशल टीम ने गैंगस्टर मान्या सुरवे को छह गोलियां मारी थी. कहते हैं कि पुलिस गोली मारने के बाद उसे गाड़ी में डाल कर तब तक मुंबई की सड़कों पर घुमाती रही, जब तक कि वो मर नहीं गया. इसके बाद उसे अस्पताल ले गई. आज़ाद हिंदुस्तान का ये पहला एनकाउंटर ही विवादों में घिर गया था.
उत्तर प्रदेश में तमाम एनकाउंटर इसलिए सवाल खड़े करते हैं कि इनमें से हर एनकाउंटर ऐलानिया कह कर किया गया. सूत्रों के मुताबिक यूपी एसटीएफ और तमाम ज़िला पुलिस को बाक़ायदा घोषित अपराधियों की लिस्ट भेजी गई और उसी लिस्ट के हिसाब से यूपी में एनकाउंटर जारी हैं.
वैसे इसे पता नहीं इत्तेफाक कहेंगे या कुछ और कि पहले खुद योगी आदित्यनाथ को यूपी सरकार और यूपी पुलिस से खुद के लिए संरक्षण मांगनी पड़ी थी. वो भी संसद भवन के अंदर. तब उन्होंने बाकायदा रोते हुए कहा था कि यूपी सरकार उन्हें झूठे आपराधिक मामलों में फंसा रही है. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. अब वही योगी यूपी की सरकार के सरदार हैं और यूपी पुलिस उनके आधीन. अब संरक्षण कोई और मांग रहा है.
Monday, January 7, 2019
सवर्ण आरक्षण पर थोड़ी देर में लोकसभा में पेश होगा बिल, पढ़ें क्या-क्या हैं प्रावधान
लोकसभा चुनाव से ऐन पहले केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने पर मुहर लगा दी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस फैसले को चुनाव से पहले का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. इस फैसले के तहत सरकारी नौकरी और शिक्षा के क्षेत्र में सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. कैबिनेट की मुहर लगने के बाद आज इसके लिए संविधान संशोधन बिल संसद में पेश किया जाएगा.
बताया जा रहा है कि दोपहर 12.30 बजे लोकसभा में ये बिल पेश हो सकता है. दोपहर दो बजे इस बिल पर लोकसभा में बहस होगी. भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी कर दिया है, जबकि कांग्रेस ने पहले ही अपने सांसदों के लिए सोमवार और मंगलवार को उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया था.
संसद में सरकार के सामने बड़ी चुनौती
संसद का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से राफेल विमान सौदे में कथित गड़बड़ी को लेकर हो रहे हंगामे में बीता. अब आज सत्र का आखिरी दिन है, ऐसे में सरकार के सामने इस बिल को पेश करने और पास करवाने की चुनौती है. वो भी तब जिस दौरान विपक्ष पूरी तरह से आक्रामक है. सूत्रों की मानें तो मोदी सरकार इस बिल को पास कराने के लिए सत्र को आगे बढ़ाने पर भी विचार कर सकती है.
गौर करने वाली बात ये भी है कि अगर सरकार को संविधान संशोधन बिल को लागू करवाना है तो उसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पास करवाना जरूरी है. लोकसभा में तो एनडीए सरकार के पास बहुमत है, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष की स्थिति मजबूत है. ऐसे में सरकार की अग्निपरीक्षा होना तय है.
केंद्र सरकार के इस फैसले को मास्टरस्ट्रोक इसलिए भी माना जा रहा है कि कई पार्टियां इसकी मांग पहले से करती आई हैं. यही कारण रहा कि सोमवार को जब कैबिनेट का फैसला आया, तो किसी भी राजनीतिक दल ने इसका पुरजोर विरोध नहीं किया. बस, चुनाव से पहले ऐलान करने के लिए सरकार की मंशा पर सवाल उठा दिए.
कांग्रेस ने सोमवार को ही साफ कर दिया था कि पार्टी इस फैसले का समर्थन करेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी युवाओं को रोजगार कब देंगे. हालांकि, कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार की टाइमिंग पर सवाल खड़े किए हैं. कांग्रेस के अलावा कई अन्य पार्टियों ने भी सरकार के फैसले का सीधे तौर पर विरोध नहीं किया है.
दरअसल, सोमवार को सभी को चौंकाते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बड़ा फैसला लिया. इस फैसले के तहत आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण समाज के लोगों को सरकारी नौकरी और शिक्षा के क्षेत्र में 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. इसके लिए सरकार की ओर से कुछ शर्तें भी रखी गई थीं.
बताया जा रहा है कि दोपहर 12.30 बजे लोकसभा में ये बिल पेश हो सकता है. दोपहर दो बजे इस बिल पर लोकसभा में बहस होगी. भारतीय जनता पार्टी ने अपने सभी सांसदों को सदन में उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी कर दिया है, जबकि कांग्रेस ने पहले ही अपने सांसदों के लिए सोमवार और मंगलवार को उपस्थित रहने के लिए व्हिप जारी किया था.
संसद में सरकार के सामने बड़ी चुनौती
संसद का शीतकालीन सत्र पूरी तरह से राफेल विमान सौदे में कथित गड़बड़ी को लेकर हो रहे हंगामे में बीता. अब आज सत्र का आखिरी दिन है, ऐसे में सरकार के सामने इस बिल को पेश करने और पास करवाने की चुनौती है. वो भी तब जिस दौरान विपक्ष पूरी तरह से आक्रामक है. सूत्रों की मानें तो मोदी सरकार इस बिल को पास कराने के लिए सत्र को आगे बढ़ाने पर भी विचार कर सकती है.
गौर करने वाली बात ये भी है कि अगर सरकार को संविधान संशोधन बिल को लागू करवाना है तो उसे लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पास करवाना जरूरी है. लोकसभा में तो एनडीए सरकार के पास बहुमत है, लेकिन राज्यसभा में विपक्ष की स्थिति मजबूत है. ऐसे में सरकार की अग्निपरीक्षा होना तय है.
केंद्र सरकार के इस फैसले को मास्टरस्ट्रोक इसलिए भी माना जा रहा है कि कई पार्टियां इसकी मांग पहले से करती आई हैं. यही कारण रहा कि सोमवार को जब कैबिनेट का फैसला आया, तो किसी भी राजनीतिक दल ने इसका पुरजोर विरोध नहीं किया. बस, चुनाव से पहले ऐलान करने के लिए सरकार की मंशा पर सवाल उठा दिए.
कांग्रेस ने सोमवार को ही साफ कर दिया था कि पार्टी इस फैसले का समर्थन करेगी, लेकिन नरेंद्र मोदी युवाओं को रोजगार कब देंगे. हालांकि, कांग्रेस ने भी केंद्र सरकार की टाइमिंग पर सवाल खड़े किए हैं. कांग्रेस के अलावा कई अन्य पार्टियों ने भी सरकार के फैसले का सीधे तौर पर विरोध नहीं किया है.
दरअसल, सोमवार को सभी को चौंकाते हुए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने बड़ा फैसला लिया. इस फैसले के तहत आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण समाज के लोगों को सरकारी नौकरी और शिक्षा के क्षेत्र में 10 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा. इसके लिए सरकार की ओर से कुछ शर्तें भी रखी गई थीं.
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